Sunday, 11 September 2011

SIXTEEN RULES FOR SUCCESS IN LIFE



 1.  Keep good company or none; never be idle.
 2.  If your hands are not usefully employed, attend to the cultivation of your mind.
 3.  Live up to your engagements; keep your own secrets if you have any.
 4.  When you speak to a person, look him in the face.
 5.  Good company and good conversation are the sinews of virtue.
 6.  Good character is above all things else.
 7.  Ever live (misfortune excepted) within your income.
 8.  Make no haste to be rich if you would prosper.
 9.  Never play at any game of chance.
 10. Earn money before you spend it.
 11. Never run into debt unless you see a way to get out again.
 12. Never borrow if you can possibly avoid it.
 13. Do not marry until you are able to support a wife.
 14. Be just before you are generous.
 15. Be temperate in a things.
 16. Save when you are young, to spend when you are old.

कैट : आसान हुआ सफ़र अब दौड़ेगी गाड़ी



कैट ( कॉमन एप्टीट्यूड टेस्ट ), प्रबंधन के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा के रूप में जाना जाता है. ‘मौजूदा समय में युवाओं की दिलचस्पी इस ओर कुछ ज्यादा  बढ़ी है. फ़िर चाहे वे साधारण स्नातक छात्र हों या इंजीनियरिंग के छात्र या किसी और क्षेत्र के. युवाओं के बीच यह एक रुझान और आवश्यकता दोनों रूप में उभरा है.’

यह बात सामने आयी आइएमएस के संचालकों से बातचीत के दौरान.मैनेजमेंट कॉलेज में बतौर एमबीए लैक्चरर कार्य कर रहीं माधवी सिंह, एमबीए करने के पहले ही एक  इंजीनियरिंग कॉलेज में पर्सनालिटी डेवलपमेंट ट्रेनर के रूप में कार्यरत थीं. माधवी कहती हैं, ‘अच्छी नौकरी और पैकेज होने के बावजूद, वहां कार्य के दौरान महसूस हुआ कि मुझे एमबीए करना चाहिए. एमबीए करने का निश्चय करते ही मैंने नौकरी छोड़ी और कैट दिया. इसके बाद कॉलेज में प्रवेश लिया.’ मैं एमबीए ऐस्परेंट्स से एक बात जरूर कहना चाहूंगी कि मैनेजमेंट कॉलेजों में प्रवेश लेने भर से आप किसी कंपनी के सीइओ बनने का ख्वाब न देखें. एक कॉलेज में बहुत सी चीजें सिखायी जाती हैं. यह छात्र पर निर्भर करता है कि वह क्या सीखता है और क्या छोड़ता है.

किसी भी मैनेजमेंट कॉलेज में प्रवेश लेने से पहले आपको यह पता होना चाहिए कि आप प्रबंधन के क्षेत्र में क्यों आ रहे हैं, आप आगे क्या करना चाहते हैं ? उसी के आधार पर कॉलेज में पढ़ाई जा रही चीजों को ग्रहण करें, विभिन्न क्रियाओं में भाग लें. ताकि आपके व्यक्तित्व में सकारात्मक विकास हो पाये.
विद्यार्थियों को कैट के स्कोर का इंतजार नहीं करना चाहिए, क्योंकि स्कोर जनवरी में आता है. तब तक अधिकतर कॉलेजों के फ़ॉर्म निकल चुके होते हैं. मॉक टेस्ट के आधार पर कॉलेज चुन लें. फ़ाइनल स्कोर मॉक टेस्ट के स्कोर के आसपास ही होता है. कैट की प्रतिष्ठा को देखते हुए इसे दिन-प्रतिदिन और बेहतर करना भी जरूरी है. इसी क्रम में कैट 2011 में भी कुछ परिवर्तन किये गये हैं.

परिवर्तन का आधार सुधारात्मक
कैट 2011 में कुछ परिवर्तन किये गये हैं. इन परिवर्तनों के पीछे मुख्य उद्देश्य कैट को अंतरराष्ट्रीय स्तर की परीक्षा बनाना है.
इस बार परीक्षा में समय से लेकर सेक्शन तक में बदलाव किया गया है. इस वर्ष के कैट में होने वाले परिवर्तन, इस प्रकार हैं-
इस बार के कैट के पेपर में तीन सेक्शन के बजाय दो सेक्शन आयेंगे. पहले सेक्शन में क्वांटिटेटिव ऐबलिटी और डेटा इंटरप्रेटेशन है. दूसरे सेक्शन में वर्बल ऐबलिटी और लॉजिकल रीजनिंग है.
इस बार के कैट में पांच मिनट एक्सट्रा दिये जायेंगे. पेपर करने के लिए कुल 140 मिनट मिलेंगे. साथ ही पेपर की शुरुआत से पहले 15 मिनट और मिलते हैं.
एक सेक्शन को 70 मिनट दिये गये हैं. इस बीच में न ही छात्र सवाल छोड़ कर आगे बढ़ सकते हैं और न ही पीछे आ सकते हैं. यानी पीछे आने और आगे बढ़ने के विकल्प पर ताला लग गया है.
टेस्ट सेंटर पर पहुंचने के समय में 30 मिनट घटाये गये हैं. पहले के मुकाबले छात्रों को सेंटर पर 30 मिनट पहले पहुंचना होगा.
इस बार उत्तर भारत में तीन नये परीक्षा केंद्र बनाये गये हैं.

कौन करता है आयोजन
कैट, आइआइएम द्वारा आयोजित होने वाली परीक्षा है. इसी के माध्यम से विभिन्न इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट कॉलेजों में प्रवेश मिलता है.



Friday, 9 September 2011

A successful man



A successful man is one who can lay a firm foundation with the bricks others have thrown at him.
David Brinkley 

Action is the foundational key to all success.
Pablo Picasso 

After I won the Oscar, my salary doubled, my friends tripled, my children became more popular at school, my butcher made a pass at me, and my maid hit me up for a raise.
Shirley Jones 

Always bear in mind that your own resolution to succeed is more important than any other.
Abraham Lincoln 

Belief in oneself is one of the most important bricks in building any successful venture.
Lydia M. Child 

Defeat is not the worst of failures. Not to have tried is the true failure.
George Edward Woodberry 

Develop success from failures. Discouragement and failure are two of the surest stepping stones to success.
Dale Carnegie 

Diligence is the mother of good fortune.
Benjamin Disraeli 

Don't aim for success if you want it; just do what you love and believe in, and it will come naturally.
David Frost 

Don't confuse fame with success. Madonna is one; Helen Keller is the other.
Erma Bombeck 

Failure is success if we learn from it.
Malcolm Forbes 

Flaming enthusiasm, backed up by horse sense and persistence, is the quality that most frequently makes for success.
Dale Carnegie 

Formal education will make you a living; self-education will make you a fortune.
Jim Rohn 

Formula for success: rise early, work hard, strike oil.
J. Paul Getty 

How can they say my life is not a success? Have I not for more than sixty years got enough to eat and escaped being eaten?
Logan P. Smith 

I couldn't wait for success, so I went ahead without it.
Jonathan Winters 

I don't know the key to success, but the key to failure is trying to please everybody.
Bill Cosby 

I honestly think it is better to be a failure at something you love than to be a success at something you hate.
George Burns 

I've failed over and over and over again in my life and that is why I succeed.
Michael Jordan 

If at first you don't succeed, try, try again. Then quit. There's no point in being a damn fool about it.
W. C. Fields

जुनून हो, तो बाधाएं भी रास्ता बना देती हैं



वेलमा रुडोल्फ़ को अमेरिकन ट्रैक और फ़ील्ड एथलीट के इतिहास में असाधारण माना जाता है. बचपन में काफ़ी दुर्बल और बीमार थीं, लेकिन इन परिस्थितियों पर जल्दी ही विजय प्राप्त कर वे एक ही ओलिंपिक में तीन स्वर्ण पदक हासिल करनेवाली अमेरिका की पहली महिला बनीं.वेलमा रुडोल्फ़ का जन्म बेथलम में 1940 में हुआ था. माता-पिता की 22 संतानों में से वह 20वीं थी. जन्म से ही उसे पोलियो था.

किशोरावस्था में भयंकर रूप से निमोनिया और बुखार ने जकड़ लिया. इन सब का असर उसके पैरों पर पड़ रहा था. कुछ लोगों ने तो उसे चलने तक से मना कर दिया था. वेलमा का सौभाग्य था कि उसे एक अच्छा परिवार मिला, जिन्होंने वेलमा की हर तरह से मदद की, उसे मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध करायीं. उसे दिन में चार बार फ़िजिकल थेरेपी दी जाती थी. जब वह पांच साल की थी, तो उसके पैरों में पट्टी बांध दी गयी, जो 11 साल की उम्र तक बंधी रही. फ़िर एक रविवार उसने वह पट्टी उतार फेंकी और चर्च की ओर चल पड़ी.
जब वेलमा 13 साल की हुईं तब वे स्कूल के बास्केटबॉल और ट्रैक टीम का हिस्सा बनीं. जल्दी ही वह दौड़ने लगीं और रेस भी जीतने लगीं. उन्हें टेनेसी स्टेट यूनिवर्सिटी के कोच ने ट्रेनिंग कैंप के लिए आमंत्रित किया. 1956 में जब वह हाइ स्कूल में थीं, तो उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के मेलबॉर्न में आयोजित ओलिंपिक में हिस्सा लिया. 200 मीटर रेस में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन रिले टीम में रजत पदक जीतने में कामयाब रहीं.

इसके बाद वेलमा ने खुद का ध्यान खेल पर और ज्यादा केंद्रित कर लिया. 1958 में टेनेसी स्टेट यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया और टाइगरबेल्स ट्रैक टीम का हिस्सा बनीं. 1960 में ओलंपिक ट्रायल के दौरान 200 मीटर रेस में उन्होंने वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम किया. इसके बाद रोम में हुए ओलंपिक खेल में 100 मीटर, 200 मीटर और 400 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीतने के बाद वह एक ही ओलिंपिक में तीन स्वर्ण पदक जीतनेवाली पहली अमेरिकी महिला बनीं.

इसके अगले साल उन्हें अमेरिका में हर साल एथलीटों को दिये जानेवाला शीर्ष पुरस्कार सुलिवन अवार्ड मिला. इसके अलावा 1993 में राष्ट्रपति क्‍लिंटन का पहला राष्ट्रीय खेल अवार्ड, ब्लैक स्पोर्ट्स हॉल ऑफ़ फ़ेम सहित कई अवार्डस मिले. उनकी ऑटोबायोग्राफ़ी वेलमा रुडोल्फ़ ऑन ट्रैक बेस्टसेलर थी. 1977 में इस पुस्तक पर एक टेली मूवी भी बनी. 12 नवंबर 1994 को ब्रेन ट्यूमर से उनकी मृत्यु हो गयी.

उन्होंने यह साबित कर दिया कि मुश्किलें कितनी भी बड़ी क्यों न हो, कुछ कर गुजरने का दृढ़ निश्चय अगर आपने कर लिया है, तो आपको रास्ते से कोई नहीं हटा सकता, आपकी शारीरिक अक्षमता भी नहीं. बचपन में वेलमा के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था कि यह लड़की कभी चल भी पायेगी, लेकिन खेल के प्रति अपने जुनून के कारण वह ओलंपिक में रिकॉर्ड ब्रेक करनेवाली गोल्ड मेडलिस्ट बनीं. हमारे पास तो इतना कुछ है, क्या हम अपने सपनों को पूरा नहीं कर सकते?

विश्व का पहला सुपर कंप्यूटर



सुपर कंप्यूटर किसी भी आम कंप्यूटर से कई हजार गुना ज्यादा स्पीड से काम करता है. इसे अमूमन स्पेस और सेटेलाइट डेवलपमेंट के लिये इस्तेमाल किया जाता है. दुनिया का पहला सुपर कंप्यूटर 60वें दशक में वजूद में आया था.

इसे डिजाइन करनेवाले सेयमर क्रे को लोग सुपर कंप्यूटर ओर्कटेक्ट के नाम से भी जानते हैं. जब क्रे ने यह कंप्यूटर डिजाइन किया, उस वक्त वह कंट्रोल डेटा कॉपरेरेशन में काम करते थे. क्रे के कंपनी छोड़ देने के बाद 1970 में इसे पहली बार मार्केट में उतारा गया. वैसे उस दौर का सुपर कंप्यूटर वर्तमान में सामान्य कंप्यूटरों के जैसा ही था.

आमतौर पर सुपर कंप्यूटरों का इस्तेमाल मौसम, रिसर्च, सेटेलाइट डेवपलमेंट और स्पेस की जानकारी के लिये किया जाता है. इन कंप्यूटरों की प्रोसेसिंग इतनी तेज होती है कि अरबों, खरबों की कोडिंग सेकेंड से भी कम वक्त में कर सकते हैं.कुछ महीनों पहले इसरो के चेयरमैन के राधाकृष्णन ने देश का सबसे लेटेस्ट सुपरकंप्यूटर लांच किया था.

इस सुपर कंप्यूटर की पूरी ड्राफ्टिंग और डेवलपमेंट विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर ने की है. इसरो का दावा है कि इस सुपर कंप्यूटर की स्पीड देश के पहले दो सुपर कंप्यूटर्स से ज्यादा है. इसे 220 टेराफ्लोप्स के साथ डिजाइन किया गया है. इसे सागा-220 नाम दिया गया है. इसरो ने इस सुपर कंप्यूटर को लांच कर दुनिया के सामने भारतीय कौशल की मिसाल पेश की. विश्व में सुपर कंप्यूटर्स : चीन ने अक्तूबर 2010 में दुनिया का सबसे तेज सुपर कंप्यूटर तिहाने-1ए लांचकिया था.

सुपर कंप्यूटर की स्पीड को फ्लॉप्स में नापा जाता है. चीन का सुपर कंप्यूटर 1015 टेराफ्लॉप्स है, जबकि इसकी तुलना में सागा की स्पीड सिर्फ़ 220 टेराफ्लॉप्स है. इससे पहला देसी सुपर कंप्यूटर टाटा का माना जाता है, जो पुणे में स्थित है. इसकी स्पीड 117.9 टेरा फ्लोप्स है. अगर विश्व के सबसे तेज सुपर कंप्यूटर की बात करें तो अमेरिका में स्थित जगुआर है, जिसे क्रे टी5 के नाम से भी जाना जाता है. जगुआर ने आइबीएम के रोड रनर को पछाड़ कर पहला स्थान प्राप्त किया है. साल 2008 से हाल तक रोड रनर को प्रथम स्थान प्राप्त था, जिसने 1 पीटा फ्लोप्स की गति सीमा को पार किया था. यह अमेरिका के रक्षा विभाग के लिये कार्य करता है.

Thursday, 8 September 2011

अपनी कमजोरी को बनायें अपनी ताकत



कई बार आपकी सबसे बड़ी कमजोरी आपकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है. इस कहानी को उदाहरण माना जा सकता है, जिसमें कार एक्सीडेंट के बाद अपना बायां हाथ गवां चुके 10 साल के एक बच्चे ने जूडो सीखने का निर्णय लिया.

लड़के ने एक बूढ़े जापानी जूडो मास्टर से प्रशिक्षण लेना शुरू किया. प्रशिक्षण में वह लड़का बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहा था, इसलिए वह समझ नहीं पा रहा था कि ओखर क्या कारण है कि तीन महीने में मास्टर ने उसे केवल एक ही दावं खेलना सिखाया. लड़के से रहा नहीं गया. उसने मास्टर से पूछा, सेंसाइ (मास्टर) क्या मुङो और ज्यादा दावं नहीं सीखना चाहिए. सेंसाइ ने उत्तर दिया, यह एकमात्र दावं है, जो तुम जानते हो, लेकिन यही वह एकमात्र दावं है और रहेगा, जिसके बारे में तुम्हें जानना चाहिए. लड़का सेंसाइ की बातों को ठीक से समझ नहीं सका, लेकिन उसे भरोसा था, इसलिए वह प्रशिक्षण लेता रहा.कुछ महीने बाद सेंसाइ उसे पहले टूर्नामेंट के लिए ले गया.

लड़के को खुद आश्चर्य हुआ कि वह पहले दो मैच आसानी से जीत गया. तीसरा मैच थोड़ा कठिन था, लेकिन कुछ देर बाद उसका प्रतिद्वंद्वी थक कर चूर हो गया. लड़के ने एक वार किया और मैच जीत गया. अपनी सफ़लता से अभी भी वह आश्चर्यचकित था, लेकिन वह फ़ाइनल में पहुंच चुका था. फ़ाइनल में उसका प्रतिद्वंद्वी ज्यादा बड़ा, मजबूत और काफ़ी अनुभवी था. लड़का थोड़ा डर गया. रेफ़री को लगा कि लड़का चोटिल हो सकता है, वह टाइम आउट करना चाहता था. वह मैच को रोकने ही वाला था कि सेंसाइ ने उसे रोकते हुए कहा- उसे जारी रखने दो.जल्द ही मैच शुरू हो गया. लड़के के प्रतिद्वंद्वी ने एक गलती कर दी, उसने अपना गार्ड हटा दिया.

लड़के ने अपना दावं आजमाया. लड़का वह मैच और टूर्नामेंट जीत चुका था. वह चैंपियन बन गया था. घर जाते समय लड़के ने सेंसाइ से हर मैच के बारे में बारीकी से पूछने लगा. फ़िर लड़के ने सेंसाइ ने पूछा कि सिर्फ़ एक दावं से ही कैसे वह यह टूर्नामेंट जीतने में सफ़ल रहा? सेंसाइ ने कहा, तुम दो कारण से यह टूर्नामेंट जीत सके. पहला, तुम उस एक दावं के लगभग मास्टर बन चुके हो, जो जूडो में सबसे कठिन माना जाता है और दूसरा, इस दावं से बचने का प्रतिद्वंद्वी के पास एक ही रास्ता था, तुम्हारे बायें हाथ को पकड़ना.

लड़के की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी ताकत बन चुकी थी.हर कोई खास और महत्वपूर्ण है. इसलिए अगर सफ़ल होना है, तो बिना अपनी कमजोरी के बारे में सोचे, आपमें जो बेस्ट है, उसे सामने लायें. अवसर की कमी नहीं है. यह आप भी नहीं जान सकते कि कब एक सही अवसर आपका दरवाजा खटखटायेगा और कब आपकी सबसे बड़ी कमजोरी ही आपकी ताकत बन जायेगी. इसलिए हमेशा सकारात्मक सोचें.

मुश्किल नहीं कुछभी, अगर ठान लीजिए



एक जगह एक मंदिर बन रहा था और एक राहगीर वहां से गुजर रहा था. उसने पत्थर तोड़ते एक मजदूर से पूछा कि तुम क्या कर रहे हो. उसने गुस्से में आ कर कहा, देखते नहीं, पत्थर तोड़ रहा हूं. वह राहगीर आगे गया, उसने दूसरे मजदूर से पूछा कि मेरे दोस्त क्या कर रहे हो?

उस आदमी ने उदासी से हथौड़े से पत्थर तोड़ते हुए कहा, रोटी कमा रहा हूं, बच्चे के लिए, पत्नी के लिए. ऐसा कहते हुए वह फ़िर से पत्थर तोड़ने के काम में लग गया. वह राहगीर थोड़ा आगे गया तो देखा कि मंदिर के पास काम करता हुआ एक मजदूर काम करने के साथ-साथ कोई गीत भी गुनगुना रहा था. राहगीर ने उससे पूछा कि क्या कर रहे हो मित्र? मजदूर अपने काम में रमा हुआ था. राहगीर की बातों पर उसका ध्यान नहीं गया. राहगीर ने फ़िर पूछा, मित्र तुम ये क्या कर रहे हो? उस व्यक्ति ने कहा, भगवान का मंदिर बना रहा हूं. इतना कह कर उसने फ़िर गाना शुरू कर दिया. तीनों व्यक्ति एक ही काम कर रहे थे, पत्थर तोड़ने का काम, पर तीनों का काम के प्रति दृष्टिकोण अलग-अलग था. तीसरा मजदूर अपने काम का उत्सव मना रहा था. अपने काम को पूजा की तरह कर रहा था, इसलिए खुश था.

जिंदगी में कम ही लोग हैं, जो अपने काम से प्यार करते हैं, और जो अपने काम से प्यार करते हैं, वही सफ़ल भी होते हैं. हर कोई सफ़ल हो सकता है, अगर काम को समर्पण के साथ करे. हम जो कर रहे हैं, उसके प्रति हमारा एटीट्यूड क्या है, सफ़लता बहुत हद तक इसी पर निर्भर है. एटीट्यूड में परिवर्तन होने से हमारी सारी गतिविधियां बदल जाती हैं.याद रखें, अगर काम के प्रति आपका एटीट्यूड यह है कि आप नहीं कर सकते, तो आप सचमुच ही नहीं कर पायेंगे. बेहतर होगा कि हमेशा खुद से यह कहें कि मैं कर सकता हूं. यह आपको ताकत देगा. अधिकतर लोग सफ़लता का मूलमंत्र कड़ी मेहनत को ही मानते हैं.

यह सही भी है, क्योंकि कड़ी मेहनत के बाद ही सफ़लता की उम्मीद की जा सकती है. लेकिन बिना उद्देश्य और राइट एटीट्यूड के की गयी मेहनत अक्सर व्यर्थ ही जाती है. इसलिए राइट एटीट्यूड और पॉजिटिव माइंडसेट के साथ काम करें. उदाहरण के लिए मार्केटिंग प्रोफ़ेशनल्स अपनी नाकामयाबी को बड़ी आसानी से यह कहते हुए टाल जाते हैं कि हमारे पास वे स्किल्स हैं ही नहीं, जिनसे प्रभावित हो कर हमारे क्लाइंट्स इंप्रेस हो सकें या मुझमें इतनी हिम्मत ही नहीं कि अमुक व्यक्ति की तरह मार्केटिंग कर सकूं. ऐसा सोचना आपको राइट मार्केटिंग एटीट्यूड से दूर कर देता है और आप सफ़ल नहीं हो पाते.

यह एटीट्यूड जितनी जल्दी अपनाएंगे, सफ़लता उतनी ही जल्दी मिलेगी. अगर अपने कैरियर के दौरान आप मन में यही सोचते रहे कि कुछ अच्छा होगा, कुछ बेहतर होगा, तो आप इंतजार ही करते रह जायेंगे. बेहतर होगा कि आगे बढ़ें और जिन चीजों के इंतजार में हैं, उन्हें खुद कर डालें. लेकिन सबसे पहले खुद से यह जरूर कहें कि मैं कर सकता हूं.